बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद हुए नए शपथ ग्रहण समारोह में एक विशेष दृश्य देखने को मिला। पटना के लोकभवन में आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ से की गई, जिसे पूरे छह अंतरों के साथ गाया गया। इसके बाद बैंड की धुन पर राष्ट्रगान भी प्रस्तुत किया गया और फिर औपचारिक कार्यक्रम आगे बढ़ा।
पहली बार पूरा संस्करण अपनाने का दावा
कार्यक्रम में इस बार वंदे मातरम् के केवल शुरुआती हिस्से नहीं, बल्कि पूरे गीत का गायन किया गया। बताया जा रहा है कि पहले सरकारी आयोजनों में आमतौर पर इसके शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते थे, जबकि बाकी हिस्सों को शामिल नहीं किया जाता था। इस बार पूरे संस्करण को प्रस्तुत किए जाने को एक अलग और महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
नए प्रोटोकॉल नियमों का असर
हाल ही में जारी किए गए प्रोटोकॉल के तहत आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को निर्धारित समय सीमा के भीतर प्रस्तुत करना अनिवार्य बताया गया है। इसके अनुसार, राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों, राज्यपाल या राष्ट्रपति के आगमन और प्रमुख सरकारी अवसरों पर पूरे गीत का गायन या वादन किया जाना आवश्यक है। इसका उद्देश्य प्रस्तुति में एकरूपता और औपचारिक सम्मान सुनिश्चित करना बताया गया है।
वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व
वंदे मातरम् गीत की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं शताब्दी में की थी। यह पहली बार 1875 में एक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ और बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। समय के साथ यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।
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सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा गीत
‘वंदे मातरम्’ को मातृभूमि के प्रति सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। इसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आंदोलनकारियों और छात्रों द्वारा व्यापक रूप से गाया जाता था। अब 150 वर्षों के इतिहास के साथ यह गीत भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान का एक अहम हिस्सा माना जाता है, जो देशभक्ति की भावना को अभिव्यक्त करता है।















































