क्या अमित शाह बनेंगे भारत के अगले उप प्रधानमंत्री? इतिहास, संकेत और सत्ता के समीकरण

देश की राजनीति में एक चर्चा तेजी से चल रही है। क्या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जल्द ही भारत के उप प्रधानमंत्री बनाए जा सकते हैं? क्या भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर उस परंपरा को दोहराने जा रही है, जिसे कभी सरदार वल्लभभाई पटेल और बाद में लालकृष्ण आडवाणी ने स्थापित किया था? या यह सिर्फ राजनीतिक अटकल है? आज हम तथ्यों, इतिहास और राजनीतिक संकेतों के आधार पर इस पूरे मुद्दे का विश्लेषण करेंगे।

सवाल ये उठता है कि आखिर ये चर्चा क्यों शुरू हुई? सबसे पहले यह स्पष्ट कर दें कि अमित शाह को उप प्रधानमंत्री बनाए जाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। न प्रधानमंत्री कार्यालय, न सरकार और न ही भाजपा की ओर से इसकी पुष्टि की गई है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा कई कारणों से तेज हुई है। पहला, अमित शाह लगातार दूसरे कार्यकाल में गृह मंत्री हैं। दूसरा, जम्मू-कश्मीर, अनुच्छेद 370, CAA, तीन नए आपराधिक कानून, नक्सल विरोधी अभियान और आंतरिक सुरक्षा जैसे बड़े फैसलों में उनकी केंद्रीय भूमिका रही है।

तीसरा ,संगठन और सरकार दोनों में उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। चौथा, 2029 की रणनीति और मोदी के बाद भाजपा के नेतृत्व को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न संभावनाओं पर चर्चा करते रहते हैं। इन्हीं कारणों से उप प्रधानमंत्री बनने की संभावना को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। यहां ये भी जानना बेहद जरूरी है कि भारत में उप प्रधानमंत्री का पद क्या है? भारत के संविधान में उप प्रधानमंत्री का कोई संवैधानिक पद नहीं है।

अनुच्छेद 74 केवल प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की बात करता है। उप प्रधानमंत्री बनाना पूरी तरह प्रधानमंत्री का राजनीतिक निर्णय होता है। इसके अलग से कोई संवैधानिक अधिकार नहीं होते। उन्हें वही अधिकार मिलते हैं जो उनके मंत्रालय के होते हैं। इसलिए उप प्रधानमंत्री बनना ज्यादा राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व रखता है। अब सवाल ये है कि अब तक कौन-कौन बने उप प्रधानमंत्री? भारत में अब तक कई नेताओं को उप प्रधानमंत्री बनाया गया है।

सरदार वल्लभभाई पटेल, स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री। जवाहरलाल नेहरू सरकार में उप प्रधानमंत्री रहे। 562 रियासतों का भारत में विलय कराया। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की नींव मजबूत की। दूसरे, मोरारजी देसाई, 1967 में इंदिरा गांधी सरकार में उप प्रधानमंत्री बने। बाद में स्वयं प्रधानमंत्री बने। तीसरे, चौधरी चरण सिंह जनता पार्टी सरकार में उप प्रधानमंत्री। बाद में प्रधानमंत्री बने।

चौथे, बाबू जगजीवन राम आपातकाल के बाद जनता सरकार में उप प्रधानमंत्री बने। पांचवें, चौधरी देवीलाल1989 और फिर 1990 में उप प्रधानमंत्री बने। छठे, लालकृष्ण आडवाणी 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उप प्रधानमंत्री बनाए गए। उस समय वे पहले से ही गृह मंत्री थे। यही तुलना आज सबसे अधिक अमित शाह से की जाती है। अगर अमित शाह और आडवाणी की समानताओं की बात करें तो दोनों भाजपा संगठन के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकार।

दोनों पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। दोनों गृह मंत्री बने। दोनों चुनावी रणनीति के मास्टर माने जाते हैं। दोनों प्रधानमंत्री के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल रहे। यहीं से तुलना शुरू होती है। लेकिन अंतर भी हैं। आडवाणी उस समय भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता थे। आज भाजपा का नेतृत्व पूरी तरह नरेंद्र मोदी के हाथों में केंद्रित है। अब सवाल ये उठता है कि अगर अमित शाह उप प्रधानमंत्री बनते हैं तो राजनीतिक संदेश क्या होगा?

अगर ऐसा होता है तो इसके कई संदेश हो सकते हैं। पहला, सरकार यह संकेत दे सकती है कि अमित शाह प्रधानमंत्री के बाद सबसे वरिष्ठ राजनीतिक चेहरा हैं। दूसरा, 2029 के लिए नेतृत्व संरचना का स्पष्ट संदेश। तीसरा, भाजपा संगठन और सरकार दोनों में शक्ति संतुलन का औपचारिक संकेत। चौथा, एनडीए सहयोगियों के बीच भी एक मजबूत समन्वयकारी भूमिका। लेकिन क्या इसकी आवश्यकता है? यहीं सबसे बड़ा सवाल आता है।

आज अमित शाह पहले से ही गृह मंत्री हैं। कैबिनेट की प्रमुख समितियों का हिस्सा हैं। सुरक्षा मामलों पर सबसे प्रभावशाली मंत्री हैं। भाजपा संगठन में भी निर्णायक प्रभाव रखते हैं। ऐसे में सवाल उठता है क्या उप प्रधानमंत्री का पद जोड़ने से उनकी वास्तविक शक्तियों में कोई बड़ा संवैधानिक बदलाव आएगा? जवाब है नहीं। बदलाव मुख्यतः राजनीतिक और प्रतीकात्मक होगा। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे भविष्य की राजनीति से जोड़ते हैं।

हालांकि भाजपा आधिकारिक रूप से कभी उत्तराधिकारी की राजनीति पर सार्वजनिक चर्चा नहीं करती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार कह चुके हैं कि भाजपा व्यक्ति नहीं बल्कि संगठन आधारित पार्टी है। इसलिए किसी भी संभावित नियुक्ति को भविष्य के नेतृत्व का अंतिम संकेत मान लेना जल्दबाज़ी होगी। अगर अमित शाह उप प्रधानमंत्री बनते हैं तो विपक्ष इसे सत्ता के और अधिक केंद्रीकरण के रूप में पेश कर सकता है।

दूसरी ओर भाजपा इसे अनुभवी नेतृत्व को औपचारिक सम्मान और प्रशासनिक समन्वय मजबूत करने का कदम बता सकती है। आज की स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि अमित शाह को उप प्रधानमंत्री बनाए जाने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे अभी राजनीतिक चर्चा और अटकल के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इतिहास बताता है कि उप प्रधानमंत्री का पद संवैधानिक शक्ति से अधिक राजनीतिक महत्व रखता है।

सरदार पटेल से लेकर लालकृष्ण आडवाणी तक, यह पद उन नेताओं को मिला जिन्होंने सरकार और राजनीति दोनों में असाधारण प्रभाव स्थापित किया। अगर भविष्य में अमित शाह को यह जिम्मेदारी मिलती है, तो इसे केवल एक प्रमोशन के रूप में नहीं, बल्कि भाजपा की राजनीतिक रणनीति, सत्ता संरचना और भविष्य के संदेश के संदर्भ में देखा जाएगा।

क्या अमित शाह भारत के अगले उप प्रधानमंत्री बनेंगे, या यह केवल राजनीतिक अटकल साबित होगी? इसका जवाब आने वाला समय देगा। लेकिन इतना तय है कि भारतीय राजनीति में सत्ता के संकेत अक्सर औपचारिक घोषणा से पहले ही चर्चा का विषय बन जाते हैं। आप क्या सोचते हैं? क्या अमित शाह को उप प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए?

( देश और दुनिया की खबरों के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं.)