इलाहाबाद हाई कोर्ट का तलाक-ए-हसन पर बड़ा फैसला: वैध तलाक पर फैमिली कोर्ट इनकार नहीं कर सकता

लखनऊ : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुए तलाक-ए-हसन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यदि तलाक-ए-हसन वैध है तो फैमिली कोर्ट तलाकशुदा घोषित करने से इनकार नहीं कर सकता। हाई कोर्ट ने लखनऊ फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।

हाई कोर्ट का अहम फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत तलाक-ए-हसन की वैधता पर बड़ी टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने कहा कि अगर पति-पत्नी के बीच तलाक को लेकर कोई विवाद नहीं है और तलाक मुस्लिम कानून के अनुसार वैध रूप से हुआ है, तो फैमिली कोर्ट तलाकशुदा घोषित करने से मना नहीं कर सकता।

फैमिली कोर्ट की भूमिका सीमित

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट की भूमिका केवल वैवाहिक स्थिति का सार्वजनिक अभिलेख (Public Record) तैयार करने तक सीमित है। अगर तलाक वैध है और उसे चुनौती नहीं दी गई है, तो कोर्ट को इसे स्वीकार करना चाहिए।

फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त

मामले में लखनऊ फैमिली कोर्ट ने तलाक को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। हाई कोर्ट ने मुस्लिम पति की प्रथम अपील को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि तलाक को चुनौती न होने के आधार पर वाद को खारिज करना उचित नहीं है।

दोनों पक्षों को तलाकशुदा घोषित किया

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में दोनों पक्षों (पति और पत्नी) को आधिकारिक रूप से तलाकशुदा घोषित कर दिया। इस फैसले से मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता मिलने का स्पष्ट संदेश गया है, बशर्ते वह शरीयत के अनुसार सही ढंग से हुआ हो।

हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

– मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध तलाक पर फैमिली कोर्ट को इनकार का अधिकार नहीं।
– यदि तलाक पर कोई विवाद नहीं है तो फैमिली कोर्ट को घोषणा करनी होगी।
– फैमिली कोर्ट केवल वैवाहिक स्थिति को रिकॉर्ड करने का काम करता है, तलाक की वैधता पर नए सिरे से बहस नहीं कर सकता जब तक चुनौती न हो।

यह फैसला मुस्लिम समुदाय में तलाक की प्रक्रिया और फैमिली कोर्ट की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश के रूप में देखा जा रहा है। हाई कोर्ट का यह निर्णय उन मामलों में मार्गदर्शक साबित होगा जहां तलाक-ए-हसन को लेकर विवाद उठता है।

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