दिल्ली की कुर्सी पर बैठने का सपना देखने वाले हर नेता की नींद उड़ाने वाली है। हम बात कर रहे हैं परिसीमन की,उस प्रक्रिया की जो देश की राजनीति का पूरा नक्शा बदल सकती है। लोकसभा और विधानसभा सीटों का नया खाका तैयार हो रहा है। अगर यह लागू हुआ, तो लोकसभा की 543 सीटें बढ़कर 750 तक पहुंच सकती हैं। यानी 200 से ज्यादा नई सीटें! और सबसे बड़ा फायदा? उत्तर प्रदेश को। यह राज्य, जो पहले से ही 80 सीटों के साथ राजनीति का ‘किंगमेकर’ है, अब 100 या उससे ज्यादा सीटों के साथ और ताकतवर हो जाएगा।
सोचिए, अगर आपका घर छोटा पड़ जाए तो क्या करेंगे? जगह बढ़ाएंगे ना! ठीक वैसे ही, परिसीमन देश की ‘राजनीतिक जगह’ को जनसंख्या के हिसाब से एडजस्ट करने की प्रक्रिया है। मतलब, लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या को फिर से तय करना। यह काम डेलिमिटेशन कमीशन ऑफ इंडिया करता है।भारत में यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है। अब तक चार बड़े परिसीमन हो चुके हैं-1952, 1963, 1973 और 2002 (जो 2008 में लागू हुआ)।
लेकिन एक ट्विस्ट! 1976 में सीटों की संख्या को फ्रीज कर दिया गया था, ताकि राज्य जनसंख्या नियंत्रण पर फोकस करें। यह फ्रीज पहले 2000 तक था, फिर बढ़ाकर 2026 कर दिया गया। अब 2026 के बाद, पहली बार बड़े स्तर पर परिसीमन की संभावना है। क्यों जरूरी है यह? क्योंकि जनसंख्या बढ़ रही है, और पुराने नक्शे से अब न्याय नहीं हो रहा। यह बदलाव राजनीति को ज्यादा लोकतांत्रिक बना सकता है, लेकिन साथ ही नई चुनौतियां भी लाएगा। क्या आप तैयार हैं इसके असर को समझने के लिए?
उत्तर प्रदेश, देश का सबसे बड़ा राज्य, जनसंख्या में भी और राजनीति में भी। आज यहां 80 लोकसभा और 403 विधानसभा सीटें हैं। लेकिन परिसीमन के बाद लोकसभा सीटें 100-110 तक पहुंच सकती हैं! यानी 20-30 नई सीटें सिर्फ यूपी को। विधानसभा की बात करें तो 403 से बढ़कर 500 के आसपास। कल्पना कीजिए-100 नई विधानसभा सीटें! यह सिर्फ नंबर नहीं, बल्कि पूरे राज्य की राजनीतिक संरचना का मेकओवर है। नए इलाके, नए वोटर, नई लड़ाइयां। यूपी पहले से ही ‘सत्ता का गेटवे’ है, अब तो यह और मजबूत हो जाएगा। लेकिन सवाल है, क्या इससे यूपी की समस्याएं-जैसे बेरोजगारी और विकास-भी हल होंगी, या सिर्फ राजनीतिक खेल बढ़ेगा?
जनसंख्या जहां तेजी से बढ़ी, वहां सीटें भी बढ़ेंगी। यूपी में कुछ इलाके ऐसे हैं जहां ‘जनसंख्या बूम’ हुआ है। जैसे: पश्चिमी यूपी: गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ। ये शहर तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, तो यहां नई लोकसभा या विधानसभा सीटें बनना तय माना जा रहा है। मध्य यूपी: लखनऊ और कानपुर जैसे बड़े शहर। राजधानी और इंडस्ट्रियल हब होने से जनसंख्या घनी है, नई सीटों का यहां मजबूत दावा। वहीं, पूर्वांचल: वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर। धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र होने से यहां भी सीटों की बढ़ोतरी संभव है।
कई बड़े जिले-जैसे लखनऊ या वाराणसी-को दो या तीन लोकसभा सीटों में बांटा जा सकता है। क्या आपका इलाका भी इसमें शामिल है? अगर हां, तो आपकी आवाज और मजबूत हो सकती है! परिसीमन सिर्फ सीटें नहीं बढ़ाएगा, बल्कि राजनीतिक बोर्ड को हिला देगा। यूपी में मुख्य खिलाड़ी-भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस-सभी को नई रणनीति बनानी पड़ेगी। नई सीटें मतलब नए जातीय समीकरण, नए उम्मीदवार और नई लड़ाइयां।
आज जो सीट किसी पार्टी का ‘गढ़’ है, वह कल पूरी तरह बदल सकती है। जैसे, अगर कोई इलाका ज्यादा शहरी हो गया तो वहां युवा वोटरों का असर बढ़ेगा। या जातीय बहुल इलाकों में नए गठबंधन बनेंगे। क्या भाजपा का ‘हिंदुत्व कार्ड’ और मजबूत होगा, या सपा-बसपा जैसे क्षेत्रीय दल नए मौके पकड़ लेंगे? यह बदलाव राजनीति को और रोमांचक बना देगा-जैसे कोई थ्रिलर मूवी!
इस बीच सवाल उठता है कि अगर यूपी की लोकसभा सीटें 100 पार पहुंचीं, तो दिल्ली की सत्ता में इसका क्या असर होगा? आज भी प्रधानमंत्री बनने का रास्ता यूपी से होकर जाता है। नरेंद्र मोदी खुद वाराणसी से सांसद हैं! नई सीटों से यूपी का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा और राष्ट्रीय दलों की हर रणनीति में यूपी केंद्रबिंदु बनेगा। कुल मिलाकर, ‘उत्तर प्रदेश जीत लो, दिल्ली जीत लो’ का फॉर्मूला और पक्का हो जाएगा। लेकिन क्या इससे देश की राजनीति ज्यादा संतुलित बनेगी, या सिर्फ उत्तर भारत का दबदबा बढ़ेगा?
परिसीमन की इस बहस में एक और ट्विस्ट-दक्षिण भारत का विरोध। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक जैसे राज्य डर रहे हैं कि जनसंख्या आधारित सीटें बढ़ने से उनका संसदीय प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। क्यों? क्योंकि वहां जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित रही है, जबकि उत्तर में तेज। यह ‘नॉर्थ vs साउथ’ की बहस को हवा दे सकती है। क्या परिसीमन से फेडरल स्ट्रक्चर प्रभावित होगा? या सरकार कोई संतुलित तरीका निकालेगी?
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