तमिलनाडु में तीन भाषा फार्मूले का मुद्दा चुनाव से पहले फिर गर्माता दिख रहा है. बुधवार, 4 फरवरी को राज्य के कृषि मंत्री एमआरके पन्नीरसेल्वम ने हिंदी और उत्तर भारतीयों को लेकर एक विवादित बयान दिया है. मंत्री ने कहा है कि उत्तर भारत के लोग, जिन्होंने सिर्फ़ हिंदी सीखी है, उनके पास दक्षिणी राज्य में नौकरी के सीमित मौके हैं और इसलिए उन्हें यहां छोटी-मोटी नौकरियां करनी पड़ती हैं. पन्नीरसेल्वम के मुताबिक इससे इतर तमिलनाडु के लोगों को राज्य की दो भाषा नीति से फायदा होता है, वो तमिल और अंग्रेजी दोनों पर फोकस करते हैं, जिससे उन्हें अमेरिका और लंदन में नौकरियां मिल जाती हैं।
मंत्री ने क्या कहा
तमिलनाडु के कृषि मंत्री एमआरके पन्नीरसेल्वम ने कहा कि उत्तर भारत से आए लोग सिर्फ हिंदी जानते हैं, इसलिए उन्हें अच्छी नौकरियां नहीं मिलतीं। वे तमिलनाडु आकर टेबल साफ करने, मजदूरी करने या पानी पूरी बेचने जैसे काम करते हैं।पन्नीरसेल्वम ने बुधवार को एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु की दो-भाषा नीति (तमिल और अंग्रेजी) की वजह से हमारे बच्चे अमेरिका, लंदन जैसी जगहों पर जाकर करोड़ों कमा रहे हैं। बीजेपी और दूसरी विपक्षी पार्टी DMK नेता के इस बयान का विरोध कर रहे है। तमिलनाडु बीजेपी ने सोशल मीडिया X पर पन्नीरसेल्वम की वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि यह केवल एक व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है, बल्कि एक पैटर्न बन चुका है।भाजपा ने कहा- DMK के कई नेता प्रवासी मजदूरों का, विशेषकर उत्तर भारतीय या हिंदी बोलने वालों का बार-बार मजाक उड़ा चुके हैं। ऐसे में जब तमिलनाडु में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ हिंसा बढ़ रही है, इस तरह के बयान गैर-जिम्मेदाराना और खतरनाक हैं।
सत्ताधारी पार्टी ने क्या कहा
ये बयान सामने आने के बाद सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने तुरंत इस पर सफाई दी है. पार्टी प्रवक्ता डॉ. सैयद हफीजुल्लाह ने यह कहकर स्थिति को संभालने की कोशिश की कि ‘हर कानूनी काम की अपनी गरिमा होती है… हम इसके (तीन भाषा पॉलिसी) के खिलाफ नहीं हैं.’ ये भी कहा कि तमिलनाडु को हिंदी बोलने वाले लोगों और उनके काम से कोई परेशानी नहीं है।
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दो-भाषा नीति बनाम राष्ट्रीय शिक्षा नीति
तमिलनाडु में दो-भाषा नीति लागू है, स्कूलों में तमिल और अंग्रेजी पढ़ाई जाती है. शिक्षा मंत्री अंबिल महेश पोय्यामोझी ने कहा था कि इससे बच्चे अपनी भाषाई विरासत से जुड़े रहते हैं और अंग्रेजी से वैश्विक अवसर पाते हैं. वहीं, केंद्र की 2019 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) में तीन-भाषा फॉर्मूला है, जिसमें अंग्रेजी और राज्य भाषा के अलावा तीसरी भाषा सीखना शामिल है. तमिलनाडु सरकार इसे हिंदी थोपने की कोशिश मानती है।पिछले साल फरवरी में केंद्र ने तीन-भाषा नीति पर जोर दिया तो विवाद भड़क उठा. तमिलनाडु ने इसे क्षेत्रीय भाषाओं पर हमला बताया. ऐतिहासिक रूप से राज्य में हिंदी विरोध मजबूत रहा है. 1930 और 1960 के दशक में हिंदी थोपने के खिलाफ दंगे हुए थे. आज भी यह मुद्दा भावनात्मक है।
चुनावी माहौल के कारण क्या ये बयान आया
डीएमके लगातार दूसरी बार सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है. सीट बंटवारे पर तनाव है, लेकिन डीएमके एआईएडीएमके (जो भाजपा से गठबंधा है) पर लगातार चौथी जीत दर्ज करने की तैयारी में है. भाषा और उत्तर भारतीय मजदूरों का मुद्दा प्रचार का हिस्सा बन सकता है.केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि एनईपी किसी भाषा को थोपने की नहीं है. यह विदेशी भाषाओं पर अत्यधिक निर्भरता कम करेगी और बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ेगी. लेकिन तमिलनाडु में इसे हिंदी के विस्तार के रूप में देखा जाता है।
INPUT-ANANYA MISHRA





































