UP: अखिलेश यादव ने कांशीराम जयंती को ‘पीडीए दिवस’ घोषित किया, मायावती भड़की, बोलीं- ये राजनीतिक नाटकबाजी

UP: उत्तर प्रदेश की सियासत में कांशीराम जयंती (KanshiRam Jayanti) को लेकर नया विवाद छिड़ गया है। समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) ने 15 मार्च 2026 को बसपा (BSP) संस्थापक कांशीराम की जयंती को ‘पीडीए दिवस’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक दिवस) के रूप में मनाने की घोषणा की है।

सपा का दावा

सपा का दावा है कि यह PDA एकता और सामाजिक न्याय के संदेश को मजबूत करने का प्रयास है, और हर जिले में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। हालांकि, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने इस घोषणा को तीखे हमले के साथ खारिज कर दिया। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इसे ‘विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाजी, ‘छलावा’ और ‘दिखावा’ करार दिया, साथ ही सपा पर बहुजन महापुरुषों के अनादर और वोट बैंक की राजनीति का गंभीर आरोप लगाया। यह घटना 2027 विधानसभा चुनाव से पहले PDA वोट बैंक पर सेंधमारी की कोशिश को दर्शाती है।

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सपा की घोषणा और उद्देश्य

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर पार्टी ने कांशीराम जयंती को PDA दिवस के तौर पर मनाने का फैसला लिया है। पार्टी का कहना है कि यह बहुजन समाज को साथ लाने और PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) गठजोड़ को मजबूत करने का प्रयास है। हर जिला मुख्यालय पर तत्कालीन कार्यक्रम आयोजित होंगे, जहां कांशीराम को श्रद्धांजलि दी जाएगी और PDA की एकता पर चर्चा होगी। सपा इसे BSP के गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति के रूप में देख रही है, खासकर दलित वोटर्स को आकर्षित करने के लिए। हाल के महीनों में सपा ने PDA फॉर्मूले पर जोर दिया है, और कई BSP से जुड़े नेता भी पार्टी में शामिल हो चुके हैं।

बसपा की तीखी प्रतिक्रिया और मायावती का बयान

बसपा प्रमुख मायावती ने सोशल मीडिया के माध्यम से सपा पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि सपा का चाल, चरित्र और चेहरा हमेशा से दलित, पिछड़ा वर्ग और बसपा विरोधी रहा है। मायावती ने लिखा कि बहुजन समाज में जन्मे महान संतों, गुरुओं और महापुरुषों का अनादर और तिरस्कार सपा की पुरानी परंपरा है। कांशीराम जयंती पर PDA दिवस मनाना ‘समय-समय पर की जाने वाली विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाजी’ है, जो केवल वोटों के स्वार्थ के लिए छलावा और दिखावा है। उन्होंने PDA को भी याद दिलाया कि सपा का असली रवैया मीडिया और सब जानते हैं। मायावती ने पुराने उदाहरणों का जिक्र करते हुए कहा कि सपा सरकार में कांशीराम नगर जिले का नाम बदलना और गेस्ट हाउस कांड जैसे घटनाक्रम सपा के दलित-विरोधी रुख को साबित करते हैं।

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विवाद के प्रमुख आरोप और राजनीतिक संदर्भ

बसपा ने सपा पर बहुजन महापुरुषों के अनादर का आरोप लगाया, जिसमें कांशीराम के नाम पर जिले का नाम बदलना और उनके सम्मान से जुड़े मुद्दों पर उदासीनता शामिल है। मायावती ने कहा कि सत्ता में रहते सपा को PDA या कांशीराम याद नहीं आते, लेकिन चुनाव नजदीक आने पर अचानक ‘याद’ आ जाती है। यह विवाद PDA वोट बैंक पर कब्जे की लड़ाई को उजागर करता है, जहां सपा BSP के पारंपरिक आधार को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। बसपा इसे BSP के संस्थापक की विरासत पर ‘हाईजैक’ करने की कोशिश मान रही है। यूपी की सियासत में यह घटना 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन और वोट ट्रांसफर की बहस को तेज कर सकती है।

राजनीतिक प्रभाव और आगे की संभावनाएं

यह विवाद दोनों पार्टियों के बीच तनाव को और बढ़ा सकता है। सपा PDA फॉर्मूले से दलित-ओबीसी-मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की रणनीति पर अड़ी है, जबकि बसपा इसे अपनी विरासत पर हमला मान रही है। मायावती के बयान से BSP कैडर में एकजुटता बढ़ सकती है। यूपी में दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं, और यह घटना दोनों पार्टियों की चुनावी तैयारी को प्रभावित करेगी। फिलहाल, यह राजनीतिक बयानबाजी का दौर है, लेकिन 15 मार्च को PDA दिवस के कार्यक्रमों से सियासी सरगर्मी और बढ़ेगी।

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