गोरखपुर : अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, गोरखपुर (AIIMS Gorakhpur) के त्वचा एवं यौन रोग विभाग द्वारा विकसित एक नवीन शल्य तकनीक को विश्व की अत्यंत प्रतिष्ठित त्वचा रोग पत्रिका Journal of the American Academy of Dermatology (JAAD) में प्रकाशन के लिए स्वीकृति प्राप्त हुई है। यह उपलब्धि संस्थान के लिए गौरव का विषय है तथा भारतीय डर्माटोसर्जरी (Dermatosurgery) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान मानी जा रही है।
इस शोध कार्य का नेतृत्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार गुप्ता ने अपनी टीम के साथ किया है। अध्ययन में प्रस्तुत की गई अभिनव तकनीक का शीर्षक “Electrocautery-guided nail plate division to enhance precision in partial nail avulsion” है। यह तकनीक विशेष रूप से इनग्रोन टोनेल (Ingrown Toenail) तथा अन्य नाखून संबंधी शल्य प्रक्रियाओं में अधिक सटीकता और न्यूनतम ऊतक क्षति सुनिश्चित करने के लिए विकसित की गई है।
पारंपरिक विधि की सीमाएं और नई तकनीक का लाभ
पारंपरिक आंशिक नेल अवल्शन (Partial Nail Avulsion) में नाखून काटते समय अधिक यांत्रिक बल लगता है, जिससे आसपास के सामान्य नाखून प्लेट, नाखून बेड या नाखून मैट्रिक्स को अनावश्यक क्षति पहुंच सकती है। इससे ऑपरेशन के बाद दर्द, घाव में देरी से भरना और नाखून की विकृति (Nail Dystrophy) जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
नई तकनीक में इलेक्ट्रोकॉटरी (Electrocautery) की सहायता से पहले नाखून पर एक नियंत्रित और सटीक ग्रूव तैयार किया जाता है, जिससे नाखून का विभाजन अत्यंत सुरक्षित, नियंत्रित और कम आघातकारी हो जाता है। इससे प्रभावित भाग को बेहद सटीकता से हटाया जा सकता है, जबकि स्वस्थ संरचनाएं पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं। यह विधि विशेष रूप से मोटे और विकृत नाखूनों (Dystrophic Nails) के इलाज में अत्यंत उपयोगी साबित होने वाली है।
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डॉ. सुनील कुमार गुप्ता का वक्तव्य
डॉ. सुनील कुमार गुप्ता ने कहा, “यह तकनीक कम संसाधनों वाले सेटअप में भी आसानी से अपनाई जा सकती है। हमारा उद्देश्य केवल रोगियों का उपचार करना नहीं, बल्कि नवीन अनुसंधान और तकनीकी नवाचारों के माध्यम से वैश्विक चिकित्सा जगत में सार्थक योगदान देना भी है।”
टीम का योगदान
इस शोध कार्य में डॉ. कविता स्वामी, डॉ. श्रीरामनन आनंद बाबू और डॉ. रवि दैया का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
JAAD को त्वचा रोग विज्ञान के क्षेत्र में विश्व की सबसे उच्च प्रभाव वाली और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में गिना जाता है। इस जर्नल में शोध प्रकाशित होना भारतीय संस्थान और शोधकर्ताओं की गुणवत्ता, वैज्ञानिक विश्वसनीयता तथा नवाचार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता है।
यह उपलब्धि न केवल AIIMS गोरखपुर की अकादमिक प्रतिष्ठा को बढ़ाएगी, बल्कि भारतीय डर्माटोसर्जरी को वैश्विक मंच पर नई पहचान भी दिलाएगी।











































