वाराणसी, उत्तर प्रदेश। वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में एमए इतिहास की सेमेस्टर परीक्षा में ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ पर विवादास्पद सवाल पूछा गया है। इससे पहले उत्तर प्रदेश पुलिस की दरोगा (सब-इंस्पेक्टर) भर्ती परीक्षा में ‘पंडित’ शब्द को ‘अवसरवादी’ के पर्याय के रूप में विकल्प में रखा गया था। दोनों घटनाओं ने ब्राह्मण समुदाय में आक्रोश पैदा कर दिया है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या यूपी में ब्राह्मणों को निशाने पर लिया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में हाल ही में दो शैक्षणिक और भर्ती परीक्षाओं में ऐसे सवाल आए हैं जिन्हें ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ लक्षित माना जा रहा है। सबसे ताजा मामला बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) का है, जहां एमए इतिहास के चौथे सेमेस्टर के पेपर में ‘आधुनिक भारतीय समाज में महिलाएं’ विषय के अंतर्गत पूछा गया: “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता शब्द से आप क्या समझते हैं? चर्चा कीजिए कि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में किस प्रकार बाधा डाली?”
यह सवाल सोशल साइंस फैकल्टी के इतिहास विभाग द्वारा आयोजित परीक्षा में पूछा गया। BHU की स्थापना महामना मदन मोहन मालवीय ने की थी और इसे हिंदू संस्कृति एवं शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। ऐसे में यहां ‘ब्राह्मणवादी’ शब्द का इस्तेमाल कई लोगों को आपत्तिजनक लगा है।
विवाद क्यों?
‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ (Brahmanical Patriarchy) एक आधुनिक सिद्धांत है, जिसे मुख्य रूप से इतिहासकार उमा चक्रवर्ती जैसे विद्वानों ने प्रस्तुत किया है। इसमें वर्ण व्यवस्था और पितृसत्ता को जोड़कर देखा जाता है, जिसमें ब्राह्मणों को महिलाओं की दशा और जाति व्यवस्था के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया जाता है। आलोचक कहते हैं कि यह सिद्धांत प्राचीन भारतीय इतिहास को एकतरफा रूप से नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है, जबकि वैदिक काल में महिलाओं की शिक्षा, विवाह और सामाजिक भूमिका पर सकारात्मक प्रमाण भी मौजूद हैं।
सोशल मीडिया पर इस सवाल को लेकर भारी प्रतिक्रियाएं आई हैं। कई ब्राह्मण संगठन, छात्र और नेता इसे ब्राह्मण-विरोधी मानसिकता का उदाहरण बता रहे हैं। BHU प्रशासन ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, हालांकि कुछ प्रोफेसरों ने कहा है कि सवाल पाठ्यक्रम से संबंधित है।
इससे पहले दरोगा भर्ती का विवाद
इससे पहले मार्च 2026 में उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर (दारोगा) भर्ती परीक्षा में हिंदी खंड का एक सवाल आया था: “अवसर के हिसाब से बदल जाने वाले को क्या कहेंगे?” विकल्पों में पंडित, अवसरवादी, निष्कपट और सदाचारी शामिल थे।
ब्राह्मण समुदाय ने इसे गहरा अपमान माना क्योंकि ‘पंडित’ शब्द ज्ञान, विद्वता और हिंदू परंपरा से जुड़ा है। भाजपा के ब्राह्मण नेताओं समेत कई संगठनों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर जांच और कार्रवाई की मांग की। UPPRPB ने जांच के आदेश दिए और सरकार ने संवेदनशीलता बरतने के निर्देश जारी किए।
बड़े सवाल
– क्या परीक्षा पेपर सेट करने वालों में पूर्वाग्रह काम कर रहा है?
– सरकारी विश्वविद्यालय और भर्ती बोर्डों में पाठ्यक्रम और सवालों की समीक्षा की जरूरत क्यों महसूस नहीं की जा रही?
– प्राचीन भारत के इतिहास को पढ़ाते समय क्या केवल नकारात्मक पहलुओं पर फोकस किया जाना चाहिए?
ब्राह्मण संगठन अब इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देख रहे हैं और कह रहे हैं कि यूपी में ब्राह्मणों को बार-बार निशाने पर लिया जा रहा है। विपक्षी दल भी मुद्दे को उठा सकते हैं।
BHU और UP पुलिस भर्ती बोर्ड दोनों ही मामलों में अभी तक विस्तृत सफाई नहीं दी है। छात्रों का कहना है कि परीक्षा में निष्पक्षता बनी रहनी चाहिए, न कि सामाजिक विभाजन पैदा करने वाले सवाल पूछे जाएं।
यह मामला सिर्फ दो परीक्षाओं तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक बहस का विषय बन गया है कि शिक्षा और भर्ती प्रक्रिया में सांस्कृतिक संवेदनशीलता कितनी जरूरी है।











































