नसीमुद्दीन की एंट्री! सपा का मास्टरस्ट्रोक या डर की राजनीति?

यूपी के कद्दावर मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी जल्द ही समाजवादी पार्टी में शामिल हो सकते है। जानकारी के मुताबिक, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और समाजवादी पार्टी के बीच कई दौर बातचीत हो चुकी है।

यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने 24 जनवरी को कांग्रेस से इस्तीफ़ा दिया था। नसीमुद्दीन कांग्रेस में प्रांतीय अध्यक्ष थे। पिछले दिनों रायबरेली जाने के लिए राहुल गांधी लखनऊ आये थे। एयरपोर्ट पर राहुल गांधी को रिसीव करने के लिए नसीमुद्दीन को एंट्री नही मिली थी और नसीमुद्दीन को एयरपोर्ट से वापस लौटना पड़ा था। इससे नाराज़ होकर नसीमुद्दीन ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था।

सपा को जरूरत नसीमुद्दीन सिद्दीकी की क्यों?

यूपी में सपा–कांग्रेस ने मिलकर 2024 लोकसभा का चुनाव लड़ा था। 2027 विधानसभा भी दोनों महागठबंधन के बैनर तले लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन चर्चा में कांग्रेस छोड़कर सपा का दामन थामने जा रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी हैं।आखिर कांग्रेस के एक बड़े नेता को सपा क्यों पार्टी में शामिल कराने जा रही है। क्या सपा को 2027 में मुस्लिम वोट बैंक खिसकने का अंदेशा है या वह ओवैसी–मायावती के संभावित गठजोड़ की काट ढूंढने में जुटे हैं। जिसके लिए उन्हे नसीमुद्दीन सिद्दीकी की जरूरत पड़ेगी?

2027 चुनाव से पहले सपा को नसीमुद्दीन सिद्दीकी के तौर पर एक बड़ा मुस्लिम चेहरा मिला है। प्रदेश में 19 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं। अभी उनका झुकाव सपा के पक्ष में अधिक है। सपा की पूरी राजनीति ही MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर टिकी है। हालांकि सपा वर्तमान में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर अपना जनाधार बढ़ाने में जुटी है। इसमें भी मुस्लिम निर्णायक भूमिका में हैं।

सपा में सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा आजम खान को माना जाता है, लेकिन वर्तमान में वे जेल में हैं और उनके खिलाफ कई IPC और सिविल के मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। सजा के चलते फिलहाल आजम, उनकी पत्नी तंजीन फातिमा या बेटा अब्दुल्ला कोई चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश बाजपेयी कहते हैं- उत्तर प्रदेश में सपा के पास आजम खान से बड़ा कोई चेहरा आज की तारीख में नहीं है। लेकिन ये भी सच है कि जिलों में उसके पास अच्छे जनाधार वाले कई मुस्लिम चेहरे हैं। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक भी आज की तारीख में सपा के साथ ही मजबूती से खड़े हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि सपा ही वह पार्टी है, जो आज की तारीख में भाजपा को हराने का दम रखती है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव, नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी में शामिल करके परसेप्शन की लड़ाई में भी आगे दिखना चाहते हैं। और इसकी वजह भी है…। बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने सीमांचल में राष्ट्रीय जनता दल और महागठबंधन को बड़ा नुकसान पहुंचाया था।

वहीं, महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में सपा के आधार वाले क्षेत्रों में भी इस बार AIMIM बाजी मारने में सफल रही। कुछ इसी तरह की कोशिश AIMIM यूपी में भी करना चाहती है। इसके लिए उसकी आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) और बहुजन समाज पार्टी पर नजर है। पहला प्रयास उसका बसपा से गठबंधन करने पर है। यदि किसी कारण बसपा से गठबंधन नहीं हो पाता है, तो वह आजाद समाज पार्टी के साथ भी जा सकती है।

ओवैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी में हैं। उत्तर प्रदेश में भले ही आज तक AIMIM को किसी भी चुनाव में कोई सफलता न मिली हो, लेकिन मुस्लिमों के बीच असदुद्दीन ओवैसी काफी लोकप्रिय हैं। युवाओं में तो उनका अलग ही क्रेज है। यही आशंका सपा प्रमुख को भी है। यही कारण है कि वे नसीमुद्दीन जैसे नेता को पार्टी में शामिल कराकर मुस्लिमों को संदेश देना चाहते हैं कि भाजपा को हराने के लिए सभी लोग सपा के साथ आ रहे हैं। सपा ही 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को हरा सकती है।

2024 लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने महागठबंधन के तहत मिलकर चुनाव लड़ा था। सपा को मुस्लिम वोटों का भारी समर्थन मिला, जिससे पार्टी ने अपनी अब तक की सबसे बड़ी सफलता हासिल की। 2027 विधानसभा चुनाव में भी दोनों पार्टियां इसी बैनर तले उतरने की तैयारी में हैं। लेकिन मुस्लिम वोट बैंक पर खतरा मंडरा रहा है। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने हाल के महाराष्ट्र निकाय चुनावों में 125 से ज्यादा सीटें जीतीं, जिसमें मुंबई के गोवंडी-मानखुर्द जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में सपा के पारंपरिक गढ़ को छीन लिया। सपा महज 2 सीटों पर सिमट गई।

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यह नतीजे सपा के लिए चिंता का विषय हैं। महाराष्ट्र में AIMIM ने सपा के वोटबैंक में सेंध लगाई, जहां अबू आसिम आजमी जैसे नेता लंबे समय से मजबूत थे। ओवैसी ने खुलकर अखिलेश यादव को निशाना बनाया था और कहा था कि मुस्लिम नेतृत्व आगे आएगा तो अखिलेश की ‘दुकान बंद’ हो जाएगी।

AIMIM का दावा है कि सपा और कांग्रेस मुस्लिमों को सिर्फ वोटबैंक मानते हैं, प्रतिनिधित्व नहीं देते। यूपी में 2022 विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 100 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन कोई सीट नहीं जीती। हालांकि उसने कई जगह सपा को नुकसान पहुंचाया था। उदाहरण के तौर पर देखें तो बाराबंकी की कुर्सी सीट पर सपा 217 वोटों से हारी। जबकि AIMIM को 8,541 वोट मिले थे। इसका भाजपा को फायदा हुआ।

जब 2024 लोकसभा में AIMIM ने यूपी में प्रत्याशी नहीं उतारे, तो मुस्लिम वोटर एकजुट रहे और सपा को फायदा मिला। बिहार–महाराष्ट्र की जीत के बाद AIMIM यूपी में होने वाले 2027 विधानसभा के लिए कमर कस चुकी है। उसका फोकस यूपी में पश्चिमी इलाकों पर है। यहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है। 2022 में सीडीएसएस-लोकनीति सर्वे के अनुसार, मुस्लिम वोटों में से 79% सपा को मिले थे। भाजपा को 8% मिला। सपा मुस्लिमों का पूरा वोट बटोरना चाहती है।

कौन हैं नसीमुद्दीन सिद्दीकी?

पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी बांदा जिले के स्योंढ़ा गांव के मूल निवासी हैं। सिद्दीकी ने साल 1988 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के साथ अपने पॉलिटिकल करियर की शुरुआत की। वह 1991 में बसपा के टिकट पर बांदा सदर सीट से पहली बार विधायक चुने गए थे। उन्होंने बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर काम किया और कहा जाता है कि वह उस समय की मुख्यमंत्री मायावती के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक थे। सिद्दीकी को 2017 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बसपा से निकाल दिया गया था। बसपा में सिद्दीकी का कद काफी बड़ा था और वह बसपा के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे थे।

INPUT-ANANYA MISHRA

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