नोएडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा से 15 जून से व्यावसायिक उड़ानों की शुरुआत होने जा रही है और टिकट बुकिंग भी शुरू हो चुकी है। शुरुआत में उम्मीद जताई जा रही थी कि दिल्ली के मुकाबले यहां से यात्रा करना सस्ता होगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश में एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) पर टैक्स केवल 1 प्रतिशत है। हालांकि शुरुआती किरायों ने यात्रियों को चौंका दिया है। लखनऊ से जेवर एयरपोर्ट तक की फ्लाइट का किराया करीब 5,000 से 6,500 रुपये तक दिख रहा है, जबकि इसी रूट पर दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा से उड़ानें लगभग 4,500 रुपये के आसपास उपलब्ध हैं। ऐसे में यात्रियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि ज्यादा किराया होने पर वे नोएडा एयरपोर्ट को क्यों चुनेंगे?
विधायक ने सरकार को लिखा पत्र, उठाए कई सवाल
जेवर क्षेत्र के विधायक धीरेंद्र सिंह ने इस मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि जब राज्य सरकार ने एयरलाइंस को टैक्स में बड़ी राहत दी है, तब यात्रियों को सस्ती टिकट का लाभ मिलना चाहिए था। सरकार ने शुरुआती तीन महीनों के लिए यूजर डेवलपमेंट फीस (UDF) में भी 25 प्रतिशत तक राहत देने की कोशिश की, लेकिन एयरपोर्ट शुल्क अधिक होने के कारण इसका फायदा यात्रियों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
भारी UDF और एयरपोर्ट शुल्क से बढ़ रही लागत
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर घरेलू यात्रियों के लिए प्रस्तावित यूजर डेवलपमेंट फीस 653 रुपये रखी गई है, जो देश के कई बड़े एयरपोर्ट्स से काफी ज्यादा है। तुलना करें तो दिल्ली एयरपोर्ट पर यह शुल्क 129 रुपये, मुंबई में 175 रुपये और कोलकाता में 547 रुपये है। एयरलाइंस कंपनियों का कहना है कि यह अतिरिक्त शुल्क सीधे टिकट कीमत में जुड़ता है, जिससे किराया बढ़ जाता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली की तुलना में जेवर एयरपोर्ट पर लैंडिंग चार्ज और अन्य एयरोनॉटिकल फीस भी काफी ज्यादा प्रस्तावित की गई हैं।
इंडिगो और एयर इंडिया ने भी जताई चिंता
देश की प्रमुख एयरलाइंस इंडिगो और एयर इंडिया ने भी एयरपोर्ट की शुल्क संरचना और कमजोर कनेक्टिविटी को लेकर चिंता व्यक्त की है। एयरलाइंस का कहना है कि यदि A321 विमान से रोजाना घरेलू उड़ानें संचालित की जाती हैं, तो हर फ्लाइट पर करीब 1.88 लाख रुपये अतिरिक्त खर्च आएगा। इससे प्रति यात्री लगभग 475 रुपये तक अतिरिक्त लागत बढ़ सकती है। एयरलाइंस का मानना है कि लंबे समय तक इतना अधिक संचालन खर्च टिकाऊ नहीं रहेगा और इसका असर यात्रियों की संख्या पर भी पड़ सकता है।
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कनेक्टिविटी अभी सबसे बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल जेवर एयरपोर्ट को मजबूत मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी का लाभ नहीं मिला है। मेट्रो, रैपिड रेल और सार्वजनिक परिवहन की सीमित सुविधा के कारण यात्रियों को एयरपोर्ट तक पहुंचने में अधिक समय और अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है। खासकर एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के यात्रियों के लिए कैब या निजी वाहन ही प्रमुख विकल्प बने हुए हैं। हालांकि एयरपोर्ट प्रबंधन का कहना है कि शुरुआती चुनौतियों के बावजूद भविष्य में यह एयरपोर्ट देश के बड़े एविएशन हब के रूप में विकसित हो सकता है।












































