मोहर्रम के आलम ने दिया मोहब्बत और भाईचारे का पैगाम, कायमगंज की गलियों में गूंजी इंसानियत की आवाज

कायमगंज, फर्रुखाबाद : मोहर्रम की छठवीं तारीख पर कायमगंज नगर में निकला पारंपरिक पारिवारिक आलम का जुलूस आस्था, अनुशासन और हिंदू-मुस्लिम एकता का अनुपम उदाहरण बन गया। सड़वाड़ा-जटवाड़ा कमेटी के तत्वावधान में निकले इस जुलूस में हजारों अकीदतमंदों ने शामिल होकर हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया और उनके बताए सत्य, न्याय एवं मानवता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया।

रात्रि लगभग 10 बजे ऐतिहासिक जामा मस्जिद से जुलूस का शुभारंभ हुआ। मुख्य आलम के साथ बच्चों द्वारा उठाए गए छोटे-छोटे आलम श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने रहे। “या हुसैन” के नारों और मातमी धुनों की गूंज से पूरा नगर गम और श्रद्धा के रंग में रंगा नजर आया। ढोल की मातमी थाप के बीच अकीदतमंद पूरे अदब और एहतराम के साथ जुलूस में शामिल हुए।

जुलूस जामा मस्जिद से शुरू होकर बजरिया, श्याम गेट, मुख्य बाजार, नगर के प्रमुख चौराहों और गल्ला मंडी से गुजरता हुआ जटवाड़ा मोहल्ले पहुंचा, जहां शांतिपूर्वक समापन हुआ। मार्ग के दोनों ओर बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग जुलूस के दीदार के लिए मौजूद रहे। लोगों ने श्रद्धा और सम्मान के साथ आलम का स्वागत किया।

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इस अवसर पर कौमी एकता की मिसाल भी देखने को मिली। जुलूस मार्ग पर विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों तथा स्थानीय लोगों द्वारा ठंडे पानी, मीठे शरबत और लंगर की व्यवस्था की गई। सेवा कार्यों में सभी समुदायों के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। कई स्थानों पर हिंदू समाज के लोगों ने भी श्रद्धालुओं का स्वागत कर आपसी भाईचारे और सौहार्द का संदेश दिया।

मोहर्रम के इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कायमगंज की गंगा-जमुनी तहजीब आज भी उतनी ही मजबूत है, जितनी वर्षों पहले थी। जुलूस के दौरान हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मिलकर प्रेम, सद्भाव और सामाजिक एकता का संदेश दिया, जिससे नगर का वातावरण भाईचारे और सौहार्द से सराबोर हो उठा।

कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन द्वारा सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। पुलिस बल पूरे मार्ग पर तैनात रहा तथा प्रशासनिक अधिकारी लगातार निगरानी करते रहे। जुलूस शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।

इस अवसर पर जावेद, आफाक, ताहिर, इकराम, महताब, आसिफ मंसूरी, शाहिद सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक एवं अकीदतमंद मौजूद रहे।

मोहर्रम के इस जुलूस ने केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन ही नहीं किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि जब समाज प्रेम, सेवा और भाईचारे की डोर से जुड़ता है, तब इंसानियत सबसे बड़ा धर्म बन जाती है।

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