Saharanpur: कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद पर हुई बुलडोजर कार्रवाई को लेकर प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि प्रशासन के अधिकारियों से लगातार बातचीत चल रही थी, लेकिन अचानक सुबह मस्जिद के ध्वस्तीकरण की खबर सामने आई। उन्होंने आरोप लगाया कि ध्वस्तीकरण का आदेश और कार्रवाई, दोनों ही संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए किए गए हैं।
जानिए क्या है पूरा मामला?
इमरान मसूद ने कहा कि इस मामले में दस्तावेजों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। उनके मुताबिक, जिस जमीन को लेकर विवाद है, राजस्व अभिलेखों में आज भी याकूब और वहीद खान के नाम दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने अदालत में 1296 फसली के दस्तावेज का हवाला दिया, लेकिन जब उनके वकीलों ने उस पर आपत्ति जताई तो उस दस्तावेज को ‘नॉट प्रेस्ड’ कर दिया गया। इसके बाद 1324 और 1359 फसली के बंदोबस्त में भी जमीन याकूब और वहीद खान के परिवार के नाम दर्ज होने की बात सामने आती है।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सरकार इस जमीन को अपनी संपत्ति मानती है तो पहले उसे यह साबित करना चाहिए कि जमीन पर उसका मालिकाना हक है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था को उसकी संपत्ति से बेदखल करने से पहले यह साबित करना जरूरी है कि वह संपत्ति वास्तव में सरकारी है। उन्होंने दावा किया कि कलेक्ट्रेट जिस जमीन पर बनी है, उसके लिए न तो किसी ने जमीन दान की और न ही उसका कोई मुआवजा दिया गया।इमरान मसूद ने कहा कि जिस मस्जिद को ध्वस्त किया गया, वह कलेक्ट्रेट बनने से पहले से मौजूद थी और उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही थी।
उन्होंने कहा कि यह केवल एक इमारत नहीं थी, बल्कि वर्षों से वहां नमाज अदा की जा रही थी।उन्होंने ध्वस्तीकरण की समय-सीमा पर भी सवाल उठाया। इमरान मसूद ने कहा कि 24 अगस्त को जिला अदालत से स्टे हुआ था और उसके बाद अपील खारिज हुई। उनके अनुसार, स्टे के दौरान बीते समय को छोड़कर शेष समय में अपील का अवसर मिलना चाहिए था। उन्होंने कहा कि यदि अदालत के आदेश में समय-सीमा को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था, तो प्रशासन को सीधे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करने से पहले नोटिस और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए था।इमरान मसूद ने कहा कि उनकी लड़ाई पूरी तरह कानूनी है और वे इस मामले को हाईकोर्ट में लेकर जाएंगे।
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