रायबरेली । सरकार का दावा है कि ‘हर घर नल से जल’ पहुंचेगा, लेकिन रायबरेली जनपद में यह योजना खुद ही प्यासी नजर आ रही है। जिले की करीब 980 ग्राम पंचायतों में जल जीवन मिशन की स्थिति ऐसी है कि कागजों पर तो पाइपलाइन बिछ गई है, पर हकीकत में ग्रामीणों के गले अभी भी सूखे हैं। कहीं टंकियां भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं, तो कहीं सात साल बीतने के बाद भी टोंटियों से पानी की एक बूंद तक नहीं टपकी। आलम यह है कि पाइप डालने के नाम पर खोदी गई सड़कों ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है, जिससे लोग अब सांस और आंखों के मरीज बन रहे हैं।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ीं टंकियां, शोपीस बना मिशन
ऊंचाहार के पूरे कुशल मजरे गोकना में साल 2018-19 में करीब 632.58 लाख की भारी-भरकम लागत से पानी की टंकी बनाई गई थी। ग्रामीण बताते हैं कि पहली टंकी में पानी भरते ही रिसाव शुरू हो गया। इसके बाद दूसरी टंकी बनाई गई, लेकिन वह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। सात साल बीत गए, पर पूरे रामबक्स, गोकना, बांधा बैरी, पूरे कुशल और होरैसा जैसे करीब 40 गांवों की 20 हजार की आबादी आज भी नल से पानी आने का इंतजार कर रही है।
खोदी सड़कें, अब उड़ रही धूल
विभाग की लापरवाही का आलम यह है कि पाइपलाइन बिछाने के लिए गांव की पक्की सड़कों और पटरियों को खोदकर वैसे ही छोड़ दिया गया। महाराजगंज के नारायणपुर गांव में पाइप तो डल गए, लेकिन जलापूर्ति शुरू नहीं हुई। वहीं, खोदी गई मिट्टी अब धूल बनकर उड़ रही है, जिससे लोग बीमार पड़ रहे हैं। ग्रामीण सुशील कुमार, राम आधार और राम सजीवन का कहना है कि वे आज भी ‘इंडिया मार्का’ हैंडपंपों के भरोसे हैं, जिनमें से कई खराब पड़े हैं या पीला और दूषित फ्लोराइड युक्त पानी उगल रहे हैं।
दो बार बढ़ी तारीख, फिर भी काम अधूरा
हैरानी की बात यह है कि योजना को पूरा करने के लिए भारत सरकार की ओर से दो बार समय सीमा (डेडलाइन) बढ़ाई जा चुकी है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी चैन की नींद सो रहे हैं। लालगंज के कोरिहरा गांव में दो साल से टंकी का निर्माण जारी है, लेकिन काम कछुआ गति से चल रहा है। पूरे बिंदा सिंह, कोरिहरा और चचिहा जैसे गांवों की प्यास बुझने का नाम नहीं ले रही।













































