BJP सरकार में शिक्षा मंत्रालय: हर कार्यकाल के साथ जुड़ा कोई न कोई बड़ा विवाद!

BJP सरकार के पिछले 12 वर्षों में शिक्षा मंत्रालय (पूर्व में मानव संसाधन विकास मंत्रालय) का नेतृत्व करने वाले चारों केंद्रीय मंत्रियों का कार्यकाल किसी न किसी बड़े विवाद, छात्र आंदोलनों या राजनीतिक दबाव के कारण चर्चा में रहा। स्मृति ईरानी, प्रकाश जावडेकर, डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और धर्मेंद्र प्रधान, चारों के कार्यकाल में अलग-अलग परिस्थितियां सामने आईं, जिन्होंने शिक्षा मंत्रालय को लगातार सुर्खियों में बनाए रखा। हाल ही में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद एक बार फिर इस मंत्रालय के इतिहास पर चर्चा तेज हो गई है।

(धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा)

स्मृति ईरानी के कार्यकाल में कई बड़े विवाद

मई 2014 से जुलाई 2016 तक शिक्षा मंत्रालय संभालने वाली स्मृति ईरानी का कार्यकाल लगातार विवादों से घिरा रहा। उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर उठे सवालों के साथ ही रोहित वेमुला की आत्महत्या, जेएनयू विवाद, एफटीआईआई छात्रों का आंदोलन और पाठ्यक्रमों में बदलाव जैसे मुद्दों ने सरकार को विपक्ष के निशाने पर रखा। जुलाई 2016 के कैबिनेट विस्तार में उन्हें मंत्रालय से हटाकर कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई, जिसे राजनीतिक हलकों में महत्वपूर्ण बदलाव माना गया।

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प्रकाश जावडेकर का अपेक्षाकृत शांत लेकिन चुनौतीपूर्ण कार्यकाल

स्मृति ईरानी के बाद जुलाई 2016 में प्रकाश जावडेकर को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। उनके कार्यकाल में नई शिक्षा नीति (NEP) के प्रारूप पर काम शुरू हुआ और कई शैक्षणिक सुधारों की प्रक्रिया आगे बढ़ी। हालांकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर को लेकर विवाद, विभिन्न छात्र संगठनों के विरोध और शिक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों पर सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। मई 2019 में कैबिनेट गठन के साथ उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।

कोविड काल और विवादों के बीच रहा निशंक का कार्यकाल

मई 2019 से जुलाई 2021 तक शिक्षा मंत्री रहे डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के सामने कोविड-19 महामारी के दौरान परीक्षाओं के संचालन की बड़ी चुनौती थी। जेईई और नीट परीक्षाओं की तारीखों को लेकर हुए विवाद, उनकी शैक्षणिक उपाधि पर उठे सवाल और कुछ सार्वजनिक बयानों को लेकर भी बहस छिड़ी। स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देते हुए उन्होंने जुलाई 2021 में पद छोड़ दिया।

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धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

जुलाई 2021 से जुलाई 2026 तक शिक्षा मंत्रालय का नेतृत्व करने वाले धर्मेंद्र प्रधान इस पद पर सबसे लंबे समय तक रहे। उनके कार्यकाल में नई शिक्षा नीति को लागू करने, कौशल विकास और डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए गए। वहीं दूसरी ओर नीट-यूजी और यूजीसी-नेट परीक्षाओं से जुड़े कथित पेपर लीक विवाद, छात्रों के प्रदर्शन, शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठे सवाल और विभिन्न आंदोलनों ने सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखा। 25 जुलाई 2026 को उन्होंने प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफा सौंप दिया और कहा कि उन्होंने छात्रों के हित और शिक्षा व्यवस्था की गरिमा को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया है।

संवेदनशील मंत्रालय, लगातार बढ़ती चुनौतियां

पिछले एक दशक के घटनाक्रम बताते हैं कि शिक्षा मंत्रालय देश के सबसे संवेदनशील मंत्रालयों में से एक माना जाता है। परीक्षा प्रणाली, छात्र आंदोलन, शिक्षा सुधार, विश्वविद्यालयों से जुड़े विवाद और राजनीतिक बहसें इस मंत्रालय को लगातार चुनौतीपूर्ण बनाती रही हैं। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब यह चर्चा भी तेज है कि अगला शिक्षा मंत्री कौन होगा और उसके सामने शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी इन चुनौतियों से निपटने की कितनी बड़ी जिम्मेदारी होगी।

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