स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के प्रबंधकों ने कुलपति प्रो. पूनम टंडन से की शिष्टाचार भेंट, बी.एड. पाठ्यक्रम की स्थायी संबद्धता के निर्णय का किया स्वागत

गोरखपुर, 2 जून। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. पूनम टंडन से आज विश्वविद्यालय से संबद्ध स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के प्रबंधकों ने शिष्टाचार भेंट की। इस अवसर पर महाविद्यालयों के प्रबंधकों ने बी.एड. पाठ्यक्रम की स्थायी संबद्धता के संबंध में कुलपति द्वारा लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय की सराहना करते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया।

उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय से संबद्ध 37 स्ववित्तपोषित बी.एड. महाविद्यालय पिछले लगभग नौ वर्षों से स्थायी संबद्धता की प्रतीक्षा कर रहे थे। हाल ही में कुलपति प्रो. पूनम टंडन द्वारा इस संबंध में आवश्यक पहल करते हुए संबद्धता विभाग को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए, जिससे संबंधित महाविद्यालयों को बड़ी राहत मिली है। प्रबंधकों ने इस निर्णय को छात्रहित एवं संस्थानों के दीर्घकालिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

बैठक के दौरान कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि माननीय कुलाधिपति एवं उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल प्रदेश के राजकीय एवं अनुदानित महाविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शैक्षणिक उत्कृष्टता तथा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को लेकर निरंतर प्रयासरत हैं। उन्होंने कहा कि स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों को भी इसी भावना के अनुरूप कार्य करते हुए शिक्षा की गुणवत्ता में निरंतर सुधार सुनिश्चित करना चाहिए।

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बैठक में महाविद्यालय प्रबंधकों ने अपने संस्थानों के संचालन से जुड़ी विभिन्न व्यावहारिक चुनौतियों एवं समस्याओं से कुलपति को अवगत कराया। कुलपति ने उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनते हुए यथासंभव समाधान का आश्वासन दिया।

प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि महाविद्यालयों को विद्यार्थियों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, आधुनिक शैक्षणिक सुविधाओं तथा नवाचारपूर्ण शिक्षण पद्धतियों को अपनाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने महाविद्यालयों से राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) के मूल्यांकन की दिशा में सक्रिय रूप से कार्य करने का भी आह्वान किया।

कुलपति ने कहा कि वर्तमान प्रतिस्पर्धी परिवेश में महाविद्यालयों को रोजगारपरक एवं कौशल-आधारित पाठ्यक्रमों के संचालन पर विशेष बल देना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों की रोजगार क्षमता में वृद्धि हो तथा वे बदलती वैश्विक आवश्यकताओं और रोजगार बाजार की मांगों के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सकें।

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