अमेठी : देश में लगातार बढ़ती घरेलू गैस की कीमतों और ऊर्जा संकट के बीच अमेठी से एक ऐसी तकनीक सामने आई है, जो भविष्य में बड़ी राहत साबित हो सकती है। अब तक लोगों के लिए परेशानी बना कचरा आने वाले समय में घरों की रसोई जलाने का माध्यम बनेगा। राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान ने ऐसी आधुनिक तकनीक विकसित की है, जिसके जरिए घरेलू और जैविक कचरे से बायोगैस तैयार की जा रही है।
संस्थान का दावा है कि यह तकनीक न केवल गैस संकट को कम करेगी बल्कि शहरों और गांवों में बढ़ती कचरा समस्या का भी प्रभावी समाधान बनेगी।
संस्थान में विकसित इस विशेष प्लांट में पत्तियां, सड़ा-गला भोजन, प्लास्टिक और अन्य घरेलू कचरे को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किया जाता है। इसके लिए संस्थान द्वारा ही विशेष मशीनें तैयार की गई हैं। पहले चरण में कचरे का पृथक्करण किया जाता है, जिसमें प्लास्टिक, लकड़ी और अन्य ठोस पदार्थों को अलग कर जैविक कचरे का पल्प तैयार किया जाता है। इसके बाद इस पल्प को दूसरी मशीन में भेजा जाता है, जहां लगभग 35 डिग्री सेल्सियस तापमान पर विशेष प्रक्रिया के जरिए उसे मीथेन गैस में बदला जाता है।
तैयार गैस को बड़े टैंक में संग्रहित किया जाता है और उससे प्रतिदिन लगभग 20 किलो क्षमता का एक गैस सिलेंडर तैयार हो रहा है। इस प्रक्रिया से निकलने वाले स्लज और पानी का भी उपयोग किया जा रहा है। स्लज से ईंट टेबल ब्लॉक्स और अन्य निर्माण सामग्री बनाई जा रही है, जबकि पानी से टॉयलेट क्लीनर हैंडवाश और अन्य उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
इस पूरी प्रक्रिया से कचरे का बेहतर निस्तारण होने के साथ-साथ उससे उपयोगी उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं। संस्थान में तैयार हो रही इसी बायोगैस का उपयोग मेस में खाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
संस्थान प्रशासन के अनुसार इस तकनीक के इस्तेमाल से हर महीने करीब एक लाख रुपये की गैस लागत की बचत हो रही है। इससे यह साबित हो रहा है कि यह तकनीक केवल प्रयोग तक सीमित नहीं है बल्कि व्यवहारिक रूप से भी बेहद उपयोगी और किफायती है।संस्थान के निदेशक प्रो. हरीश हिरानी ने बताया कि अब तक बायोगैस मुख्य रूप से गोबर आधारित होती थी, लेकिन नई तकनीक में घरेलू और जैविक कचरे को भी ऊर्जा में बदला जा रहा है।
उन्होंने कहा कि यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाए तो भविष्य में गैस की बढ़ती कीमतों और ऊर्जा संकट से काफी हद तक राहत मिल सकती है। इस पूरे प्लांट को तैयार करने में करीब 11 से 12 लाख रुपये की लागत आई है और करीब 10 लोग इसे संचालित करते है।












































