UP: धर्मनगरी काशी में गुरुवार से भगवान जगन्नाथ की तीन दिवसीय पारंपरिक रथयात्रा उत्सव का शुभारंभ हो गया। भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ सुसज्जित रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण के लिए निकले। रथयात्रा के पहले ही दिन सुबह से मंदिर परिसर और यात्रा मार्ग पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। दर्शन के लिए करीब दो किलोमीटर लंबी कतारें लगी रहीं और भक्तों ने भगवान के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि एवं मंगल की कामना की।
विशेष श्रृंगार और 56 भोग से हुई पूजा-अर्चना
रथयात्रा की शुरुआत से पहले तड़के भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विधि-विधान से पीतांबर श्रृंगार किया गया। इसके बाद मंगला आरती संपन्न हुई और मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। भगवान को परंपरा के अनुसार 56 प्रकार के व्यंजनों का महाभोग अर्पित किया गया। पूजा के उपरांत भक्तों के बीच तुलसी दल और नानखटाई का प्रसाद वितरित किया गया, जिसे प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
पांच किलोमीटर के मार्ग पर गूंजे ‘जय जगन्नाथ’ के जयकारे
करीब पांच किलोमीटर लंबे रथयात्रा मार्ग पर हजारों श्रद्धालु भगवान के रथ के साथ चलते नजर आए। पूरे रास्ते “जय जगन्नाथ” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय बना रहा। यात्रा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा। पुलिस, प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट की ओर से भीड़ प्रबंधन, यातायात नियंत्रण और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किए गए, जिससे यात्रा शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ती रही।
16 से 18 जुलाई तक चलेगा रथयात्रा महोत्सव
जगन्नाथ मंदिर के ट्रस्टी एवं पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह ने बताया कि इस वर्ष रथयात्रा मेला 16 जुलाई से 18 जुलाई तक आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने काशी सहित देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं से उत्सव में शामिल होकर भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने की अपील की। उनका कहना है कि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं पहले से सुनिश्चित कर दी गई हैं।
करीब ढाई सौ वर्षों से निभाई जा रही परंपरा
काशी की जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना माना जाता है। मान्यता के अनुसार वर्ष 1765 के बाद पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मुख्य पुजारी का तत्कालीन शासक से विवाद होने पर वे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं को लेकर काशी पहुंचे और अस्सी क्षेत्र में रहने लगे। बाद में दिव्य प्रेरणा मिलने पर यहां मंदिर की स्थापना की गई और तभी से काशी में रथयात्रा निकालने की परंपरा शुरू हुई। समय के साथ यह आयोजन वाराणसी के सबसे प्रमुख धार्मिक उत्सवों में शामिल हो गया, जिसमें हर वर्ष देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।















































