‘सेजिया पे लोटे काला नाग, कचौड़ी गली सून कइला बलमु…’, कोक स्टूडियो के ‘कचौड़ी गली’ ने जगाई बनारस की लोक-संगीत विरासत

कोक स्टूडियो भारत का नया गीत ‘कचौड़ी गली’ रिलीज होते ही संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हो गया है। भोजपुरी लोकसंगीत की समृद्ध परंपरा को नए अंदाज में पेश करने वाले इस गीत को मशहूर गायिका रेखा भारद्वाज और बिहार के इंडी लोक कलाकार उत्पल उदित ने अपनी आवाज दी है। संगीतकार निशांत नागर द्वारा तैयार किया गया यह गीत एक सदी से भी पुराने लोकगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है।

विरह की पीड़ा से जन्मी अमर कजरी

गीत की शुरुआती पंक्तियां, ‘सेजिया पे लोटे काला नाग, कचौड़ी गली सून कइला बलमु’ एक ऐसी प्रेमिका की भावनाओं को व्यक्त करती हैं, जिसका प्रिय रोजगार की तलाश में मिर्जापुर चला गया है। उस दौर में मिर्जापुर पूर्वांचल का प्रमुख व्यापारिक और औद्योगिक केंद्र माना जाता था, जहां बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में जाते थे।

वाराणसी की मशहूर कचौड़ी गली से जुड़ा है गीत का नाम

वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के निकट स्थित कचौड़ी गली आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है। लाहौरी टोला क्षेत्र की यह संकरी गली अपनी प्रसिद्ध कचौड़ियों के लिए जानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, यह स्थान कभी स्वतंत्रता सेनानियों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों की बैठकों का केंद्र हुआ करता था, जहां चाय और कचौड़ी के साथ सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होती थी।

तवायफ गौहर जान और अधूरी प्रेम कहानी

लोककथाओं के अनुसार, ‘कचौड़ी गली’ कजरी की जड़ें 19वीं शताब्दी में मिलती हैं। माना जाता है कि यह गीत बनारस की एक प्रसिद्ध तवायफ गौहर जान की प्रेमकथा से प्रेरित है। दालमंडी में रहने वाली गौहर जान को चौक क्षेत्र में आने-जाने वाले असलम नामक युवक से एकतरफा प्रेम हो गया था। हालांकि दोनों के बीच कभी बातचीत नहीं हुई, लेकिन गौहर जान उसके प्रति गहरी भावनाएं रखने लगीं।

प्रेमी की तलाश और रंगून का सफर

कहानी के अनुसार, एक दिन असलम अचानक गायब हो गया। बाद में पता चला कि वह रोजगार के लिए मिर्जापुर गया था। कुछ समय बाद यह भी जानकारी मिली कि अंग्रेजी शासन के दौरान उसे रंगून (वर्तमान यांगून, म्यांमार) भेज दिया गया था। गीत की पंक्तियां प्रेमिका की उस पीड़ा को दर्शाती हैं, जो अपने प्रिय की जुदाई में तड़प रही है।

‘गिरमिटिया गीत’ के रूप में भी पहचान

लोक-संगीत विशेषज्ञों का मानना है कि ‘कचौड़ी गली’ को गिरमिटिया गीतों की श्रेणी में भी देखा जाता है। ये वे गीत हैं, जो औपनिवेशिक काल में विदेशों में भेजे गए भारतीय मजदूरों और उनके बिछड़ने के दर्द को अभिव्यक्त करते थे। इस कारण यह गीत केवल प्रेम-विरह ही नहीं, बल्कि पलायन और सामाजिक विछोह की कहानी भी कहता है।

बिस्मिल्लाह खान और मालिनी अवस्थी ने भी दी पहचान

प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपने कार्यक्रमों में इस कजरी की धुन बजाया करते थे। वे अक्सर बताते थे कि बचपन से उन्होंने इस गीत को बनारस की गलियों में सुना है। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने भी इसे अपनी आवाज दी और अपनी पुस्तक ‘चंदन किवाड़’ में इससे जुड़ी लोककथाओं का उल्लेख किया है।

पूर्वांचल के पलायन का दस्तावेज भी है यह गीत

इतिहासकारों के अनुसार, यह गीत पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से हुए बड़े पैमाने पर पलायन का भी प्रतीक है। एंग्लो-बर्मी युद्ध और ब्रिटिश शासन के दौरान हजारों लोगों को रंगून और बर्मा भेजा गया था। इनमें कई लोग सैनिक बने, जबकि बड़ी संख्या में लोग मजदूरी और अन्य कार्यों में लगे।

युद्ध, गरीबी और रोज़गार की तलाश

1885 के बाद भी ब्रिटिश नीतियों के कारण बर्मा की ओर पलायन जारी रहा। वहां बंदरगाहों, चावल मिलों और निर्माण कार्यों में रोजगार के अवसर उपलब्ध थे। कठिन परिस्थितियों, बीमारियों और संघर्षों के बावजूद बड़ी संख्या में भारतीय परिवारों ने वहां जीवन बसाया।

‘बर्मा’ सरनेम की कहानी

भोजपुरी साहित्य के जानकारों के अनुसार, आज भी कई परिवार अपने नाम के साथ ‘बर्मा’ या ‘वर्मा’ उपनाम जोड़ते हैं, जो उनके पूर्वजों के बर्मा प्रवास की याद दिलाता है। यही वजह है कि ‘कचौड़ी गली’ केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि पूर्वांचल के इतिहास, प्रेम, विरह और पलायन की जीवंत सांस्कृतिक विरासत भी है।

नई पीढ़ी तक पहुंची सदियों पुरानी धरोहर

कोक स्टूडियो भारत के नए संस्करण ने इस ऐतिहासिक भोजपुरी लोकगीत को आधुनिक संगीत के साथ जोड़कर नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत किया है। इससे न केवल लोकसंगीत को नई पहचान मिली है, बल्कि बनारस और पूर्वांचल के इतिहास की अनकही कहानियां भी फिर से चर्चा में आ गई हैं।

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