UP: खून से सने हाथ बन रहे आत्मनिर्भर, कैदियों के प्रोडक्ट्स की बाजार में डिमांड, जेल से ही पाल रहे परिवार

वाराणसी : कभी अपराध की दुनिया से जुड़े लोगों को सुधारने के लिए कहा जाता था- ‘सुधर जाओ, वरना जेल की रोटी खानी पड़ेगी।’ लेकिन वाराणसी में केंद्रीय कारागार की तस्वीर अब बदल रही है। यहां बंद कैदियों के हुनर से तैयार उत्पाद अब लोगों की पसंद बन रहे हैं। केंद्रीय कारागार के आउटलेट पर बिकने वाला देसी घी, सरसों का तेल, अचार, ब्रेड, बिस्कुट और क्रीम रोल लोगों को खूब पसंद आ रहा है।

केंद्रीय कारागार में बंदियों को विभिन्न उद्योगों में काम करने का अवसर दिया जा रहा है। यहां बेकरी में ब्रेड, बिस्कुट, क्रीम रोल और क्रीम ब्रेड तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा आम, कटहल और मिक्स अचार समेत कई उत्पाद बनाए जाते हैं। जेल में फर्नीचर निर्माण का काम भी होता है। यहां तैयार कुर्सियां और अन्य फर्नीचर सरकारी कार्यालयों में भी इस्तेमाल किए जाते हैं।

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वरिष्ठ जेल अधीक्षक राधा कृष्ण मिश्रा के मुताबिक, कारागार में करीब 850 बंदी विभिन्न कार्यों में अपना योगदान दे रहे हैं। जेल प्रशासन की ओर से उन्हें आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। काम के बदले बंदियों को मजदूरी मिलती है, जिससे वे अपने परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में सहयोग करते हैं।

मुख्य सड़क पर स्टॉल से बढ़ी बिक्री

जेल प्रशासन ने उत्पादों की बिक्री के लिए पहले कारागार परिसर के पास स्टॉल बनाया था। वहां मुख्य रूप से बंदियों से मिलने आने वाले लोग ही खरीदारी करते थे, जिससे बिक्री सीमित थी। बाद में मुख्य सड़क पर प्राचीन काली माता मंदिर के पास नया स्टॉल शुरू किया गया।

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जेल अधीक्षक के अनुसार, स्थान बदलने के बाद उत्पादों की बिक्री में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। पहले जहां एक स्टॉल से प्रतिदिन करीब 20 से 30 हजार रुपये की बिक्री होती थी, वहीं अब यह बढ़कर 60 से 70 हजार रुपये तक पहुंच गई है। इनमें देसी घी, ब्रेड और बिस्कुट की मांग सबसे अधिक बताई जा रही है।

मजदूरी से परिवार का सहारा

लंबी सजा काट रहे कई बंदियों के परिवार आर्थिक चुनौतियों से जूझते हैं। ऐसे में जेल में मिलने वाला रोजगार उनके लिए सहारा बन रहा है। बंदियों को उनके काम के बदले मजदूरी दी जाती है, जिसे वे अपने परिवार तक पहुंचाते हैं। इससे परिवार के भरण-पोषण के साथ बच्चों की पढ़ाई में भी मदद मिलती है।

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