गोरखपुर, 13 मई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीक के इस तेजी से बदलते दौर में शिक्षण पद्धति भी निरंतर परिवर्तित हो रही है। एक समय था जब शिक्षा “चॉक एंड टॉक” तक सीमित थी, लेकिन आज हम “क्लिक एंड कनेक्ट” के युग में प्रवेश कर चुके हैं। एआई के इस दौर में परंपरागत शिक्षण, आधुनिक तकनीक और मानवीय मूल्यों के समन्वय से ही भविष्य का प्रभावी शिक्षण मॉडल तैयार होगा। आज के शिक्षक को “3 एफ” — फैसिलिटेटर, फिल्टर और फ्यूचर-रेडी मेंटर — की भूमिका निभानी होगी तथा स्वयं को नई तकनीकों के अनुरूप निरंतर अद्यतन करना होगा।
उक्त विचार दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अजय शुक्ल ने यूजीसी-मालवीय मिशन टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर (एमएमटीटीसी) एवं भौतिकी विभाग, डी.डी.यू. गोरखपुर विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” विषयक रिफ्रेशर कोर्स में “फ्रॉम चॉक एंड टॉक टू क्लिक एंड कनेक्ट : टीचर्स, टेक्नोलॉजी एंड ट्रांसफॉर्मेशन इन द एआई एरा” विषय पर आयोजित व्याख्यान में व्यक्त किए।
कार्यक्रम के समन्वयक एवं भौतिकी विभागाध्यक्ष प्रो. राकेश कुमार तिवारी ने प्रो. अजय शुक्ल का स्वागत करते हुए कहा कि वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन ला रही है तथा शिक्षकों के लिए तकनीकी रूप से अद्यतन रहना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
अपने व्याख्यान में प्रो. अजय शुक्ल ने शिक्षा जगत में हो रहे तकनीकी परिवर्तन पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षा अब केवल ब्लैकबोर्ड और पारंपरिक कक्षा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि “क्लासरूम से क्लाउडरूम” तक पहुँच चुकी है। उन्होंने “ब्लैकबोर्ड टू डैशबोर्ड”, “बुकशेल्फ्स टू ब्राउज़र्स” तथा “चॉक डस्ट टू डिजिटल ट्रस्ट” जैसे प्रभावशाली प्रयोगों के माध्यम से शिक्षा के बदलते स्वरूप को रेखांकित किया।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए “इंडिया’ज़ टेकेड” के विज़न का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान दशक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल परिवर्तन का दशक है, जहाँ शिक्षकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
प्रो. शुक्ल ने सरल भाषा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए बताया कि एआई ऐसी तकनीक है जो मशीनों को मानवीय बुद्धिमत्ता से जुड़े कार्य करने में सक्षम बनाती है। उन्होंने मशीन लर्निंग, जेनरेटिव एआई, प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, चैटबॉट, लार्ज लैंग्वेज मॉडल, डीप लर्निंग तथा नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग जैसे महत्वपूर्ण एआई शब्दों और अवधारणाओं की विस्तृत व्याख्या की।
व्याख्यान के दौरान प्रो. शुक्ल ने चैटजीपीटी, जेमिनी, ग्रामर्ली, कैनवा एआई, क्विलबॉट, परप्लेक्सिटी एआई तथा माइक्रोसॉफ्ट को-पायलट जैसे एआई टूल्स की उपयोगिता पर भी चर्चा की और बताया कि ये उपकरण शिक्षण, शोध, प्रस्तुतीकरण, अकादमिक लेखन एवं कंटेंट निर्माण में किस प्रकार सहायक हो सकते हैं।
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उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को “को-पायलट” के रूप में देखना चाहिए, “पायलट” के रूप में नहीं। उन्होंने कहा कि तकनीक शिक्षण प्रक्रिया को सहयोग दे सकती है, लेकिन शिक्षक की संवेदनशीलता, नैतिकता, मानवीय स्पर्श और मार्गदर्शन का कोई विकल्प नहीं हो सकता।
प्रो. शुक्ल ने एआई से जुड़े प्लेज़रिज़्म, मिसइन्फॉर्मेशन तथा “एआई हैलुसिनेशन” जैसे मुद्दों पर भी चिंता व्यक्त की तथा अकादमिक ईमानदारी, तथ्य सत्यापन और एआई के नैतिक उपयोग पर विशेष बल दिया। उन्होंने भविष्य की शिक्षा को “फिजिटल एजुकेशन” बताते हुए भौतिक एवं डिजिटल शिक्षा के संतुलित समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से 150 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की।यह रिफ्रेशर कोर्स 7 मई से 20 मई तक संचालित है .
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