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UP Politics: ‘हाँ, मैं 2027 का चुनाव लड़ूंगा’, बाहुबली BrajeshSingh के ऐलान से BJP-SP में हलचल!

अगर मैं कहूं कि पूर्वांचल की राजनीति में एक ऐसा नाम, जिसके जिक्र से कभी पुलिस फाइलें खुलती थीं आज वही नाम विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है तो क्या आप यकीन करेंगे?” वो शख्स जिसके ऊपर कभी 5 लाख का इनाम था जिसके खिलाफ हत्या, गैंगस्टर, मकोका और अपहरण जैसे दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए जिसका नाम सुनकर कभी पूर्वांचल के गांवों में लोग दरवाजे बंद कर लेते थे आज वही शख्स खुलेआम बनारस के अस्सी घाट पर बैठकर कह रहा है “हां मैं विधानसभा चुनाव लड़ूंगा

क्या पूर्वांचल की राजनीति फिर बदलने वाली है? क्या बाहुबली राजनीति की वापसी हो रही है? क्या मुख्तार अंसारी के बाद बने पावर वैक्यूम को भरने की तैयारी है? क्या बीजेपी या NDA का कोई बड़ा प्लान है? या फिर… ये सिर्फ एक चुनाव लड़ने का ऐलान नहीं बल्कि पूर्वांचल में ताकत के नए दौर की शुरुआत है। आज इस वीडियो में हम सिर्फ बृजेश सिंह की कहानी नहीं बताएंगे बल्कि समझेंगे कि आखिर क्यों, 2027 का यूपी चुनाव पूर्वांचल से तय हो सकता है।

वाराणसी, अस्सी घाट, पप्पू की मशहूर चाय की दुकान, आम दिन की तरह लोग चाय पी रहे थे लेकिन अचानक कैमरे घूमने लगे भीड़ बढ़ने लगी और सामने बैठे थे पूर्वांचल की राजनीति और अपराध की दुनिया का सबसे चर्चित नाम बृजेश सिंह। किसी ने सवाल पूछा “क्या आप विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?” बृजेश सिंह मुस्कुराए और सिर्फ एक लाइन बोले “हां विधानसभा चुनाव लड़ूंगा, कहां से लड़ूंगा ये भी जल्द बता दूंगा।

बस इतना सुनते ही पूर्वांचल की राजनीति में भूचाल आ गया। क्योंकि ये बयान किसी आम नेता का नहीं था ये उस आदमी का बयान था जो पिछले तीन दशक से खुद चुनाव कम लेकिन चुनाव जिताने और हराने की ताकत ज्यादा रखता था। यानी अब तक जो Kingmaker माना जाता था वो अब खुद King बनने की तैयारी कर रहा है। लेकिन आखिर बृजेश सिंह हैं कौन? नई पीढ़ी शायद उन्हें सिर्फ पूर्व MLC के रूप में जानती हो लेकिन 90 के दशक में पूर्वांचल की राजनीति का मतलब था दो नाम एक तरफ मुख्तार अंसारी और दूसरी तरफ बृजेश सिंह।

इन दोनों की दुश्मनी सिर्फ राजनीतिक नहीं थी, बल्कि पूरे पूर्वांचल के इतिहास की सबसे लंबी और खूनी गैंगवारों में से एक मानी जाती है। ठेकेदारी रेलवे कोयला शराब सरकारी निर्माण हर बड़े कारोबार पर कब्जे की लड़ाई धीरे-धीरे गैंगवार में बदल गई। और पूर्वांचलदो हिस्सों में बंटता चला गया। 80 और 90 के दशक में पूर्वांचल की राजनीति जातीय समीकरण और बाहुबल दोनों पर चलती थी।

इसी दौर में, बृजेश सिंह का नाम तेजी से उभरने लगा। उनके समर्थक उन्हें “रॉबिनहुड” बताते रहे.जबकिपुलिस रिकॉर्ड में उनका नाम गंभीर आपराधिक मामलों में दर्ज होता गया। हत्या, हत्या की साजिश ,अपहरण गैंगस्ट, मकोका एक समय ऐसा आया जब उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन पर 5 लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया। लेकिन दिलचस्प बात ये है जितना पुलिस उन्हें तलाश रही थी उतना ही पूर्वांचल के कई इलाकों में उनका राजनीतिक प्रभाव बढ़ता जा रहा था।

अगर आज का युवा लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड़ का नाम सुनता है तो 90 के दशक में पूर्वांचल मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह की गैंगवार से कांपता था। दोनों के समर्थकों के बीचकई खूनी संघर्ष हुए। कई लोगों की जान गई। पुलिस रिकॉर्ड कोर्ट और मीडिया सालों तक इसी गैंगवार की खबरों से भरे रहे। राजनीति अपराध और जातीय समीकरण एक-दूसरे में इस तरह घुल गए किपूर्वांचल की राजनीतिइन्हीं दो नामों के इर्द-गिर्द घूमने लगी।

फिर आया वो दौर जब बृजेश सिंह फरार हो गए लगातार बढ़ते मुकदमे पुलिस का दबाव और कई राज्यों में तलाश बृजेश सिंह कई सालों तक फरार रहे। आखिरकार 2008 में उड़ीसा के भुवनेश्वर से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद एक-दो नहीं बल्कि तीस से ज्यादा मामलों की सुनवाई शुरू हुई। कई लोगों को लगा अब बृजेश सिंह की राजनीतिक कहानी खत्म हो जाएगी। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। एक-एक करगवाह पलटते गए।

कई मामलों में सबूत कमजोर पड़ते गए। और करीब 13 साल जेल में रहने के बाद 2022 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से उन्हें जमानत मिल गई। जेल से बाहर आते ही लोगों ने सोचा शायद अब वो सार्वजनिक जीवन से दूर रहेंगे। लेकिन बृजेश सिंह ने सियासत की दूसरी पारी खेलने का फैसला कर लिया। यहां कहानी और दिलचस्प हो जाती है। क्योंकि जब बृजेश सिंह जेल में थे तब भी उनके परिवार का राजनीतिक दबदबा कम नहीं हुआ।

यही वो हिस्सा है जो समझाता है कि आखिर आज भी पूर्वांचल की राजनीति में बृजेश सिंह का नाम इतना प्रभावशाली क्यों माना जाता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है। अगर बृजेश सिंह चुनाव लड़ते हैं तो सबसे ज्यादा नुकसान किसका होगा? बीजेपी का समाजवादी पार्टी का या फिर किसी और का? इस सवाल का जवाब समझने के लिए पहले पूर्वांचल की राजनीति का गणित समझना पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल हमेशा बाकी प्रदेश से अलग रहा है। यहां सिर्फ पार्टी का सिंबल काम नहीं करता। यहां जातीय समीकरण स्थानीय नेटवर्क व्यक्तिगत प्रभाव और दशकों से बने रिश्ते भी वोट तय करते हैं। इसी वजह से यहां कई ऐसे नेता रहे जिन्होंने कभी मंत्री बने बिना भी पूरे इलाके की राजनीति प्रभावित की। और इन्हीं नामों में सबसे चर्चित नाम रहा बृजेश सिंह। एक समय पूर्वांचल की राजनीति दो नामों के इर्द-गिर्द घूमती थी।

एक तरफ मुख्तार अंसारी दूसरी तरफ बृजेश सिंह। दोनों की अदावत सिर्फ अपराध की दुनिया तक सीमित नहीं रही। इसका असर पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक दिखाई देता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। मुख्तार अंसारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके परिवार का प्रभाव अब भी है लेकिन पहले जैसा दबदबा नहीं माना जाता। यही वह जगह है जहां राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि बृजेश सिंह अपनी नई भूमिका तलाश रहे हैं।

क्या यह सिर्फ चुनाव लड़ना है? या राजनीतिक विरासत स्थापित करने की शुरुआत? अब तक बृजेश सिंह खुद चुनावी राजनीति से दूरी बनाकर रखते थे। लेकिन उनका परिवार लगातार चुनाव जीतता रहा। भाई पत्नी भतीजा हर कोई किसी न किसी राजनीतिक पद पर रहा। यानी सिस्टम में मौजूद भी थे और सीधे सामने भी नहीं आते थे। लेकिन अब खुद सामने आने का फैसला सिर्फ एक चुनाव नहीं बल्कि नई राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश माना जा रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल अगर चुनाव लड़ेंगे तो कहां से? आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई। लेकिन राजनीतिक गलियारों में तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। पहला चंदौली क्योंकि यहां परिवार का मजबूत आधार पहले से मौजूद है। भतीजे सुशील सिंह लगातार विधायक हैं। संगठन मजबूत है। स्थानीय नेटवर्क तैयार है। दूसरा वाराणसी जहां एमएलसी राजनीति के जरिए परिवार दशकों से प्रभाव बनाए हुए है। बनारस में हाल के महीनों में सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता भी बढ़ी है।

मंदिरों के जीर्णोद्धार जनसंपर्क स्थानीय कार्यक्रम ये सब अचानक नहीं हो रहा। तीसरा जौनपुर बेल्ट। जहां लंबे समय से राजनीतिक संभावनाओं की चर्चा होती रही है। हालांकि अभी कुछ भी तय नहीं है। लेकिन इतना साफ हैसीट ऐसी होगी जहां व्यक्तिगत प्रभाव सबसे ज्यादा काम करे। क्या बीजेपी टिकट देगी? यहीं से कहानी और दिलचस्प हो जाती है। क्योंकि अब सवाल पार्टी का है। अगर बीजेपी टिकट देती है. तो विपक्ष हमला करेगा।

अगर टिकट नहीं देती और बृजेश निर्दलीय उतरते हैं तब भी समीकरण बदल सकते हैं। कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर चुनाव लड़ते हैं तो एनडीए के किसी सहयोगी दल से लड़ने की संभावना ज्यादा हो सकती है क्योंकि इससे राजनीतिक संदेश भी जाएगा और सीधी असहज स्थिति भी नहीं बनेगी। ओम प्रकाश राजभर पहले ही कह चुके हैं कि वो बृजेश सिंह को सुभासपा का टिकट देंगे, अगर वो चुनाव लड़ने को तैयार हुए। हालांकि अभी तक इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

अब यहां सवाल उठता है कि बृजेश के चुनाव लड़ने से किसे सबसे ज्यादा टेंशन हो सकती है? अगर बृजेश मैदान में उतरते हैं तो सबसे ज्यादा चुनौती समाजवादी पार्टी के सामने मानी जा रही है। क्यों? क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में सपा ने पूर्वांचल में अपना आधार बढ़ाया है। गैर यादव पिछड़े दलित और मुस्लिम वोटों को जोड़ने की रणनीति पर लगातार काम किया गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इसका असर दिखाई दिया। लेकिनअगर दूसरी तरफ सवर्ण वोट विशेषकर ठाकुर और भूमिहारएकजुट होने लगे तो मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है।

क्या सवर्ण गोलबंदी होगी? यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। पूर्वांचल में राजपूत भूमिहार और ब्राह्मण तीनों का प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक रहता है। अगर इनमें एक बड़ा हिस्सा किसी एक चेहरे के पीछे खड़ा हो गया तो चुनाव का परिणाम बदल सकता है। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। क्योंकि आज की राजनीति सिर्फ जाति पर नहीं चलती। विकास कल्याणकारी योजनाएं स्थानीय नेतृत्व और पार्टी संगठन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए केवल एक चेहरे के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। क्या पुराना दौर लौट सकता है? यही सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। क्या पूर्वांचल फिर उसी दौर में लौटेगा जहां बाहुबली चुनाव तय करते थे? या अब राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है? असलियत शायद दोनों के बीच कहीं है। आज कानून व्यवस्था पहले जैसी नहीं है। चुनाव आयोग की निगरानी भी पहले से ज्यादा सख्त है। सोशल मीडिया ने भी राजनीति का तरीका बदल दिया है।

लेकिन स्थानीय प्रभाव व्यक्तिगत नेटवर्क और वर्षों से बने सामाजिक समीकरणआज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। जनता क्या सोचती है? दिलचस्प बात यह है कि कई जगहों पर लोग उन्हें अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं उन्होंने क्षेत्र में लोगों की मदद की। कई लोग उनके पुराने राजनीतिक प्रभाव को याद करते हैं। वहीं कुछ लोग उनके आपराधिक अतीत को भी चुनावी मुद्दा मानते हैं। यानी समर्थन भी है  विरोध भी है और यही लोकतंत्र की असली तस्वीर है।

क्या यह सिर्फ एक सीट का चुनाव होगा? बिल्कुल नहीं। अगर बृजेश सिंह मैदान में उतरते हैं तो इसका असर केवल उनकी सीट तक सीमित नहीं रहेगा। आसपास की कई सीटों पर संदेश जाएगा। स्थानीय नेताओं की रणनीति बदलेगी। उम्मीदवारों का चयन प्रभावित होगा। और चुनावी प्रचार का पूरा नैरेटिव बदल सकता है। बीजेपी क्या करेगी? यह भी देखने वाली बात होगी। क्योंकि बीजेपी पिछले कुछ वर्षों से जीरो टॉलरेंस’और कानून व्यवस्था को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती रही है।

ऐसे में अगर किसी बाहुबली छवि वाले नेता को लेकर कोई राजनीतिक फैसला होता है तो विपक्ष निश्चित तौर पर सवाल उठाएगा। दूसरी तरफ बीजेपी के सामने जीत का गणित भी होगा। यानी राजनीति और छवि दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। क्या विपक्ष फायदा उठाएगा? समाजवादी पार्टी कांग्रेस और दूसरे दल निश्चित तौर पर उनके पुराने मामलों को मुद्दा बना सकते हैं। लेकिन.दूसरी तरफ अगर बृजेश स्थानीय स्तर पर मजबूत समर्थन जुटाने में सफल रहेतो मुकाबला आसान भी नहीं रहेगा।

असल सवाल यह नहीं है कि बृजेश सिंह चुनाव लड़ेंगे या नहीं। असल सवाल यह है क्या पूर्वांचल की जनता उन्हें बाहुबली के रूप में याद रखेगी या नेता के रूप में स्वीकार करेगी? क्योंकि लोकतंत्र में आखिरी फैसला न अदालत करती हैन टीवी डिबेट न सोशल मीडिया बल्किमतदाता करता है। और 2027 में पूर्वांचल का मतदाता इस सवाल का जवाब देने वाला है। क्या आपको लगता है कि बृजेश सिंह की चुनावी एंट्री पूर्वांचल का पूरा राजनीतिक समीकरण बदल सकती है?

क्या वह सिर्फ एक उम्मीदवार होंगे या कई सीटों का खेल बदल देंगे? और सबसे बड़ा सवाल ,अगर वह मैदान में उतरते हैं तो सबसे ज्यादा नुकसान किस पार्टी को होगा?

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